आजादी की ६३ वीं वर्षगांठ हर्षौल्लास के साथ संपन्न हो गई। पर हम यूँ भी कह सकते हैं कि हर बार की ही तरह फ़िर एक बार 15 अगस्त हमने रस्म अदायगी की तरह निभा दी। और ये सिर्फ़ इस छोटे से बडौत कस्बे के लोगों पर ही लागू नही होता , बल्कि इस देश के ज्यादातर नागरिकों ने, नौकरशाहों ने, नेताओं ने और अभिनेताओं ने , सभी ने स्वंतंत्रता दिवस को (independence day, so called) एक रस्म की तरह निभा दिया है । रस्म इसलिए कि हम हर बार आते हैं , कुछ भाषण देते हैं, कुछ गीत सुनाते हैं और फ़िर देश के सामने खड़ी सारी समस्याओं से नजरें चुराकर निकल जाते हैं। हम सब जानते हैं कि हमारा ही वोट हमारे खिलाफ इस्तेमाल हो रहा है, हमारे ही पैसे पर नेता लोग गुलछर्रे उडा रहे हैं। इस देश के सामने विकट समस्यायें खड़ी हैं परन्तु हमें कोई नेतृत्व नहीं मिल पा रहा। समाज विकारों से भरा है, पर इलाज करने वाला कोई नही । हमारे लालच का, हमारे स्वार्थ का कोई अंत नहीं हो रहा है।
पर हम आँखें मूंदे इस उम्मीद में प्रार्थना रत हैं कि कहीं से कोई फ़रिश्ता आ जाएगा जो इस देश की रक्षा करेगा । जबकि आज ये स्पष्ट हो चुका है कि अब फरिश्तों ने पैदा होना छोड़ दिया , अब तो अजमल आमिर कसाब जैसे मानवता के दुश्मन पैदा होते हैं , या इस जैसे लोगों का समर्थन करने वाले घर-बाहर के आका ! गरीबी, भुखमरी , अशिक्षा, बीमारियाँ और महामारियां, बढती हुयी जनसंख्या और उसके साथ बढ़ता प्रदूषण , बेरोजगारी, गुंडागर्दी,भय एवं असुरक्षा का माहौल, नक्सलवाद, आतंकवाद, और ना जाने कितनी समस्याएं कई सालों से हमारा पीछा नहीं छोड़ रही हैं। इतनी निराशा ! इतना अँधेरा ! कौन है जो हमें इस सब से आज़ाद कराएगा ? कौन है जो हमारी इन बेडियों को काटेगा ? कब तक हम यूँ ही इन्तजार करते रहेंगे ? सोचिये और भयभीत हो जाएये या दूसरा रास्ता ये है कि सोचना छोड़ कर अपनी हिस्सेदारी निभाना शुरू कीजिये और भयभीत होना छोड़कर उन्हें भय से भीत करना शुरू कर दीजिये । अब ये आपके ऊपर है कि आप कौन सा रास्ता चुनते है।
जय हिंद, जय भारत !!
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